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मंगलवार, 23 मई 2023

Peace with wealth धन के साथ शांति

  केवल धन ही शांति क्यों नही दे सकता ?

धन से आप दुनिया का बेहतरीन खाना, बेहतरीन बिस्तर खरीद सकते है और बेहतरीन संगीत सुन सकते हैं, परन्तु यदि मन अशान्त हो, तो आप के चेहरे से परिलक्षित होने लगता है कि आप प्रसन्न नही हैं ? फिर इसका मतलब धन के साथ कुछ और भी है, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है, और वह चीज है मानसिक शान्ति । मेरा अपना मानना है कि इस भौतिक युग मे धन महत्वपूर्ण है,  पर इतना भी नही कि मानसिक शान्ति क्षीण हो जाए, दोनों का संतुलन जरूरी है । 

कैसे मिले शान्ति ?

जिनका जुड़ाव थोड़ा भी आध्यात्म से है उन्हे अनुभव  है कि, किसी भी परिस्थिति मे शांत कैसे रहा जा सकता है ? सिर्फ अज्ञानता से दूरी ही शान्ति का अनुभव करा सकता है और अज्ञानता दूर होती है स्वाध्याय  और ध्यान से । परिस्थिति कैसी भी हो ? आप उस पर क्या महसूस करते हैं ?सिर्फ वही आप को दुखी या सुखी बनाता है ।  अपने लोगों के बीच, मै अक्सर एक कथा सुनाया करता हूँ जो कुछ इस प्रकार है -
मंदिर के पुजारी की दो औलादें लगभग रोज ही संध्या आरती के समय उनके पीछे होती थी, ये दो औलादें उनके दो जुड़वाँ पुत्र थे जिनकी उम्र 8 साल थी । पुजारी का घर मंदिर के पास ही के गाँव मे था । पुजारी का लगभग सारा समय मंदिर के देख रेख और पूजा आरती मे बीत जाता था, समय ठीक हो तो इतनी तेजी से भागता है कि पता ही नही चलता । पुजारी की पत्नी आध्यात्मिक थी, बच्चों की परवरिश के साथ नियमित ध्यान और अच्छी पुस्तकों का अध्ययन ही उसकी दिनचर्या थी । मंदिर के चढ़ावे से इतनी आमदनी हो जाती थी कि परिवार का गुजारा आराम से हो जाता था । सब कुछ समान्य चल रहा था । 
 एक दिन पुजारी को कुछ असामान्य लगा, उसे उस संध्या उसके बच्चे नही दिखे थे, वह आरती के अन्तिम पंक्ति के बाद भी एक बार घूमा था, परन्तु वे तब भी नही दिखाई दिये थे । सब कुछ नित्य कर्म निपटाने के बाद पुजारी ने मंदिर का कपाट बंद किया और घर पहुँचा । पहुँचते ही बच्चों के बारे मे सवाल किया, पत्नी ने कहा आप परेशान न हों, यहीं कहीं होंगे । पत्नी ने नित्य की भाँति उसे चाय पान कराया । कुछ समय पश्चात भोजन का समय हुआ, बच्चे तब भी नही दिखाई दिये, उसके प्रश्न पर पत्नी ने वही जबाब दिया और उसे भोजन करा दिया । अब शयन काल होने को आ चुका था, उसने पुनः पत्नी की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा । अब पत्नी ने कहा कि "मेरा एक प्रश्न है आप से, आज से आठ साल पहले किसी ने दो हीरे मुझे रखने के लिए दिये थे और आज वे मांगने आ गए,  मुझे क्या करना चाहिए ?" पुजारी ने सीधा कहा "इसमे संकोच की क्या बात है ? जिसका था अब वह मांग रहा है तो निश्चित ही उसे बिना संकोच वापस कर देना चाहिए ।" पत्नी उन्हे घर के पिछले आहाते मे ले गई जहां दो बच्चों की लाशें सफ़ेद कपड़ों मे लिपटी रखी हुई थीं । 
पुजारी हीरों का मतलब समझ चुका था । 
मुझे नही लगता कि पुजारी की पत्नी के जीवन मे इस से भी ज्यादा कुछ बुरा हो सकता था लेकिन उसकी सोच ने उसे तो इस दुख से उबरने का मौका दिया ही साथ ही पुजारी को भी एक मार्ग दे दिया कि अब दुखी होने का कोई कारण नही । जिसने हीरे रूपी बच्चे दिया था वही ले गया, अपना कोई ज़ोर नही तो फिर शोर क्यों मचाना ?
हमारे भी जीवन मे यही होता है, हम अपने ही सोच से सुखी या दुखी, शान्त या अशान्त होते हैं ।  कभी कभी आपको भी ये अवश्य महसूस होता होगा कि इस सृष्टि मे हर छोटी चीज, बड़ी चीज के शिकार के लिए है उसके उदर मे चाहे अनचाहे छोटे को जाना ही पड़ता है, यह एक फूड चेन है । परन्तु यह कोई असमान्यता नही है बल्कि एक प्राकृतिक संतुलन है । जब हम यह समझ जाते हैं, कि हम इस सृष्टि नामक मशीनरी के कुछ कल पुर्जे मात्र हैं तो हमारा दुख स्वतः ही गायब हो जाता है । जो नही समझ पाता जीवन भर फड़फड़ाता है शान्ति उसके लिए स्वप्न मात्र रह जाता है ।  
एक और कथा के माध्यम से अपनी बात और स्पष्ट करना चाहूँगा -
एक नाव मे पुरुष और स्त्री मिला कर कुल करीब पचास छप्पन लोग थे, नाव नदी के बिलकुल बीच तक पहुचने ही वाली थी, बरसात के कारण नदी मे जल का प्रवाह चरम पर था, उसी समय मौसम खराब हुआ और भयंकर तूफान जैसा माहौल बन गया । नाव  मे एक सरदार भी अपनी पत्नी के साथ थे, पत्नी के चेहरे पर डर के कारण पीलापन छा गया, परन्तु सरदार पूर्व की भाँति अविचलित थे । उनकी पत्नी ने डर से ज़ोर से उनका हाथ पकड़ लिया । सरदार ने तुरंत अपनी चमचमाती तलवार निकाल ली और पत्नी के गर्दन पर रख दी परन्तु पत्नी को उस तलवार ने जरा भी भय नही दिया । थोड़ी देर मे तूफान भी शान्त हो गया और पत्नी भी, सरदार ने अपनी तलवार म्यान मे रख ली । पत्नी ने कहा आप को तूफान से डर नही लगा ? सरदार ने कहा बिलकुल भी नही । जब मैंने तलवार तुम्हारी गर्दन पर रखी थी तो तुम्हें डर लगा था ? पत्नी ने कहा बिलकुल भी नही । क्यों कि तलवार तुम्हारे हाथ मे थी और मुझे भरोसा था कि तुम मुझे मार नही सकते थे । सरदार ने कहा इसी तरह मुझे अपने रब पर भरोसा था कि सब कुछ उसके हाथ मे है , वह मुझे तभी मारेगा जब ऐसा करना जरूरी होगा, जिसे रोका जाना गलत होगा । 
अब अगर धारणा इस तरह बन जाए तो जीवन मे  दुख या अशान्ति  आ ही नही सकती है, असंभव  । 
पैसे कमाने के साथ यदि हम अपना थोड़ा भी रुझान आध्यात्म की तरफ रखें, नियमित ध्यान करें तो एक समय ऐसा आ सकता है कि पैसा तनाव नही आनंद और शान्ति प्रदान करेगा ।